#

#

ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
professional logo

भक्त पदरेणु  Bhakt Padhrenu

1

भक्त पदरेणु  (श्रीविप्रनारायण )
    भगवान् की लीला विचित्रा है। किसी-किसी पर वे बहुत शीघ्र ढुल जाते हैं और किसी-किसी की वे बड़ी कठिन परीक्षा लेकर तब उन्हें अपना कृपापात्रा बनाते हैं। और जिस प्रकार काँटे को काँटे से ही निकाला जाता है, उसी प्रकार किसी-किसी को मायामुक्त करने के लिये वे उस पर अपनी माया का ही प्रयोग करते हैं। विप्रनारायण के साथ उन्होंने तीसरे प्रकार का प्रयोग किया था।
    विप्रनारायण भगवान् की वन माला के अवतार माने जाते हैं। इनका जन्म एक पवित्रा ब्राह्मणकुल में हुआ था। इन्होंने भलीभाँति वेदाध्ययन करके अपने को समस्त वेदों के सारभूत भगवान् के चरणों में ही सर्वतोभावेन सम£पत कर देना चाहा था। ये भगवान् से प्रार्थना करते- ‘मुझे आपकी कृपा के सामने इन्द्रा का पद भी नहीं चाहिये। शास्त्रों में मनुष्य की आयु सौ वर्ष की बतायी गयी है। इसमें से आधी तो निद्रा में ही बीत जाती है और आधी में से आधी भी पन्द्रह वर्ष बालक पन की अज्ञान-अवस्था में निकल जाते हैं और शेष आयु भी भूख-प्यास, काम-क्रोधादि विकारों तथा नाना प्रकार की व्याधियों और मानसिक कष्टों में ही बीतती है। अतः हे नाथ! ऐसी कृपा कीजिये कि मुझे इस संसार में पुनः जन्म न लेना पड़े और यदि जन्म लेना भी पड़े तो मुझे आपकी सेवा का सुख निरन्तर मिलता रहे।’ इस प्रकार मन-ही-मन प्रार्थना करते हुए श्रीरंगनाथ जी के स्थान पर गये और वहाँ अपने-आपको श्रीरंगजी के अर्पण कर विष्णुचित्त की भाँति मन्दिर के चारों ओर एक सुन्दर बगीचा लगा दिया। वहाँ से फूल ला-लाकर और उनके हार गूँथ-गूँथकर वे भगवान् को अर्पण किया करते थे। स्वयं एक वृक्ष के नीचे एक मामूली झांेपड़ी बनाकर रहते थे और भगवान श्रीरंगनाथ के प्रसाद से ही जीवननिर्वाह करते थे। संसार उनकी दृष्टि में मानो था ही नहीं, भगवान श्रीरंगनाथ जी उनके लिये सब कुछ थे। वे कहते- ‘अहा! जब-जब मैं भगवान को शेषशय्या पर लेटे हुए देखता हूँ, मेरा शरीर प्रेम-विह्नल हो जाता है।’ वे जब इस प्रकार भगवान के ध्यान और भजन में लीन थे, भगवान ने कदाचित उन्हें शुद्ध करने और उनकी वासनाओं का क्षय करने के लिये ही उनकी एक बार कठिन परीक्षा ली।
     वहाँ एक बड़ी रूपवती वारांगना रहती थी, जिसके सौन्दर्य पर स्वयं राजा भी मुग्ध थे। उसका नाम देवदेवी था। एक दिन वह अपनी बहिन को साथ लेकर विप्रनारायण के बगीचे में आयी और वहाँ की प्राकृतिक शोभा को देखकर दोनों-की-दोनों चमत्कृत हो गयीं। सहसा देवदेवी की दृष्टि विप्रनारायण पर पड़ी। ये भगवान का नाम लेते जाते थे और तुलसी के वृक्षों को सींचते जाते थे। वे अपनी धुन में इस प्रकार मस्त थे कि उन्होंने देवदेवी की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा। उनकी इस उपेक्षा से देवदेवी के मान को बड़ी ठेस पहुँची। उसने सोचा- ‘मेरे जिस अनुपम सौन्दर्य पर राजा लोग भी मुग्ध हैं, यह तपस्वी युवा उसकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखता।’ देवदेवी की बहिन ने कहा- ‘जिनका चित्त अखिल सौन्दर्य के भण्डार भगवान नारायण के चरणकमलों का चंचरीक बन चुका है, वे क्या नारी के घृणित रूप पर आसक्त हो सकते हैं?’ देवदेवी ने बड़े गर्व के साथ कहा- ‘मैं भी देखूँगी कि यह ब्राह्मणकुमार मेरे रूपपाश में कैसे नहीं बँधता।’ उसकी बहिन ने कहा- ‘तुम्हारी यह आशा दुराशामात्रा है। यदि तुम्हारे रूप का जादू इस ब्राह्मणकुमार पर चल गया तो मैं छः महीने तक तुम्हारी दासी होकर रहूँगी।’ देवदेवी ने भी बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा- ‘यदि मेरा चक्कर इस पर न चल सका तो मैं भी छः महीने तक तुम्हारी दासी होकर रहूँगी।’ इस प्रकार दोनों बहिनों में होड़ बन गयी।
    उक्त घटना को कई दिन हो गये। एक दिन अकस्मात् विप्रनारायण ने देखा कि उनके सामने एक संन्यासिनी खड़ी है। उन्होंने चकित होकर पूछा- ‘तुम कौन हो और यहाँ क्यों आयी हो? तुम्हारा यहाँ इस प्रकार आना उचित नहीं, अतः शीघ्र लौट जाओ।’ सन्यासिनी ने कहा- ‘महाराज! एक बार मेरी करूण-कथा सुन लीजिये, इसके बाद जैसा उचित समझें। मेरी माता मुझे आबरू बेचकर धन कमाने के लिये बाध्य करती है; किंतु मेरी इच्छा नहीं है कि मैं अपने जीवन को इस प्रकार कलंकित करूँ। अतः मैं आपकी शरण में आयी हूँ, आप कृपाकर मुझे आश्रय दीजिये। मैं इसी वृक्ष के नीचे पड़ी रहकर आपके बगीचे की रक्षा करूँगी, भगवान् के लिये सुन्दर हार गूँथकर आपके अर्पण करूँगी और आपकी जूँठन पाकर अपना शेष जीवन व्यतीत करूँगी।’ सरलहृदय विप्रनारायण को उसकी इस कपटभरी करुण कथा को सुनकर दया आ गयी और उन्होंने दया-परवश होकर उसे अपने बगीचे में रहने के लिये अनुमति दे दी।
    माघ का महीना है। बड़े जोर की वर्षा हो रही है और साथ-साथ ओले भी गिर रहे हैं। वह दीन-हीन संन्यासिनी  बाहर ठिठुर रही है, उसकी साड़ी पानी से तर हो गयी है। उसकी इस दशा को देखकर विप्रनारायण को दया आ गयी, उन्हांेने उसे अपनी झांेपड़ी में बुला लिया और उसे पहनने को सूखे वस्त्रा दिये। शास्त्रों की आज्ञा है कि पुरुष को परस्त्राी के साथ और स्त्राी को परपुरुष के साथ एकान्त में भूलकर भी नहीं रहना चाहिये। ऐसे समय मन का वश में रहना बड़ा कठिन होता है। विप्रनारायण उस छद्मवेशिनी संन्यासिनी के चंगुल में फँस गये। उनकी तपस्या, उनका शास्त्राज्ञान, उनका त्याग, उसका वैराग्य सब कुछ उस वारांगनाकी मोह-सरिता में बह गया! कुसंग का परिणाम होता ही है। 
    विप्रनारायण, जो अब तक भगवान् की सेवा में तल्लीन रहते थे, आज एक वेश्या के क्रीतदास हो गये। देवदेवी ने अब अपना असली रूप प्रकट कर दिया। वह वापस अपने स्थान को चली गयी और विप्रनारायण प्रतिदिन खिंचे हुए उसके घर जाने लगे। उन्होंने अपना सर्वस्व उसके चरणों में न्यौछावर कर दिया। उनकी विपुल सम्पत्ति, उनके देवोपम गुण और उदात्त चरित्रा सब कुछ स्वाहा हो गया।
    परंतु जिसने एक बार भगवान् के चरणों का आश्रय ले लिया, भगवान क्या उसकी उपेक्षा कर सकते हैं? कदापि नहीं। देवदेवी ने विप्रनारायण का सब कुछ लूटकर उन्हें दर-दर का भिखारी बना दिया। जब उनके पास उसकी पूजा करने को कुछ भी न रहा, तब उसने उन्हें दुत्कारकर अपने घर से बाहर निकाल दिया और लाख गिड़गिड़ाने पर भी भीतर न आने दिया। विप्रनारायण निराश होकर लौट गये, परंतु देवदेवी के प्रति आकर्षण कम न हुआ।
    रात्रि का समय है। देवदेवी ने देखा कि कोई बाहर खड़ा हुआ उसके द्वार को खटख्टा रहा है। पूछने पर मालूम हुआ वह विप्रनारायण का सेवक है। उसने कहा- ‘ विप्रनारायण ने आपके लिये एक सोने का थाल भेजा है।’ थाल देखकर देवदेवी फूली न समायी। उसने इट से थाल को ले लिया और नौकर से कहा- ‘ विप्रनारायण जी को जल्दी मेरे पास भेज दो, मैं उनके लिये व्याकुल हो रही हूँ।’ इधर उसी आदमी ने विप्रनारायण को जगाकर कहा- ‘जाओ, तुम्हें देवदेवी याद करती है।’ इस संवाद को सुनकर विप्रनारायण के निर्जीव देह में मानों प्राण आ गये। वे चारपाई से उठकर सीधे देवदेवी के यहाँ पहुँचे और देवदेवी ने उस दिन उनकी बड़ी आवभगत की। अब हमंे यह देखना है कि विप्रनारायण का यह नौकर कौन था।
    दूसरे दिन प्रातःकाल श्रीरंगनाथ जी के मन्दिर में बड़ी सनसनी फैल गयी। पुजारी ने देखा कि ‘श्रींरगनाथ जी का सोने का थाल गायब है।’ राज्य के कर्मचारियों ने जाँच-पड़ताल आरम्भ की। चोरी का पता लगाने के लिये गुप्तचर भी नियुक्त हुए। अन्त में वह थाल देवदेवी के यहाँ मिला। देवदेवी ने कर्मचारियों को बतलाया कि ‘यह थाल कल रात को ही उसे विप्रनारायण का नौकर दे गया था।’ विप्रनारायण ने कहा- ‘मैं तो एक दीन-हीन कंगाल हूँ, मेरे पास नौकर कहाँ से आया। और न मेरे पास इस प्रकार की मूल्यवान चीजें ही हैं।’ थाल मन्दिर में पहुँचा दिया गया। देवदेवी को चोरी का माल स्वीकार करने के लिये राज्य की ओर से दण्ड दिया गया और विप्रनारायण को निगलापुरी के राजा की ओर से हिरासत में रखा गया; क्योंकि श्रीरंगम् का मन्दिर निगलापुरी के राजा के अधीन ही था। राजा की विप्रनारायण के सम्बन्ध में यह धारणा थी कि वे बड़े अच्छे भक्त हैं; अतः उनकी बुद्धि इस सम्बन्ध में कुछ निर्णय नहीं कर सकी। उन्होंने सोचा, ‘जो विप्रनारायण श्रीरंगनाथ जी की इतनी भक्ति करते हैं, क्या वे उन्हीं की वस्तु को इस प्रकार चुरा सकते हैं? इसी उधेड़बुन में उन्हें नींद लग गयी। स्वप्न में उन्हें श्रीरंगनाथ जी ने दर्शन दिये और कहा- ‘यह सब लीला मैंने अपने भक्त का उद्धार करने के लिये की है। मैंने ही उनका नौकर बनकर थाल देवदेवी के यहाँ पहुँचाया था। मैं तो सदा ही अपने भक्तों का अनुचर रहा हूँ। विप्रनारायण बिलकुल निर्दोष है; उन्हें वापस अपनी कुटिया में भेज दो जिससे पुनः मेरी भक्ति और सेवा में प्रवृत्त हो जायँ।’ राजा को स्वप्न देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ, उनका हृदय भगवान की दया का स्मरण करके गद्गद हो गया। उन्हें इस बात के लिये बड़ा पश्चाताप हुआ कि मैंने एक भक्त को हिरासत में रखकर उनका अपमान किया और उन्हें तुरंत मुक्त कर दिया।
    इस घटना से विप्रनारायण की आँखें खुल गयीं, उनके नेत्रों से अज्ञान का पर्दा हट गया। उनके नेत्रों में आँसू भर आये और हृदय पश्चाताप से भर गया। वे दौड़े हुए श्रीरंगजी के मन्दिर में पहुँचे और भगवान के चरणों में गिरकर उनकी अनेक प्रकार से स्तुति और अपनी गर्हणा करने लगे। उन्होंने कहा- ‘प्रभो! मैं बड़ा नीच हूँ, बड़ा पतित हूँ, पापी हूँ; फिर भी आपने मेरी रक्षा की। आपने मेरे इस वज्रहृदय को भी पिघला दिया। मैंने अब तक अपना जीवन व्यर्थ ही खोया, मेरा हृदय बड़ा कलुषित है। मेरी जिह्ना ने आपके मधुर नाम का परित्याग कर दिया, मैंने सत्य और सदाचार को तिलांजलि दे दी, मैंने स्वयं अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारी और मैं एक वारांगना के रूपजाल में फँस गया। मैं अब इसीलिये जीवन धारण करता हूँ, जिससे आपकी सेवा कर सकूँ।  मैं जानता हूँ आप अपने सेवकों को कदापि परित्याग नहीं करते। मैं जनता की दृष्टि से गिर गया हूँ, मेरी साधन-सम्पत्ति जाती रही। अब संसार में आपके सिवा मेरा कोई नहीं है। पुरुषोत्तम! अब मैंने आपके चरणों को दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया है। आप ही मेरे माता-पिता हैं, आपके सिवा मेरा कोई रक्षक नहीं है। जीवनधन! अब मुझे आपके कृपा के सिवा और किसी का भरोसा नहीं है।’ इसी समय से विप्रनारायण का जीवन पलट गया, वे दृढ़ वैराग्य के साथ भगवान् की भक्ति में लग गये। उन्होंने अपना नाम ‘भक्तपदरेणु’ रखा और बड़ी श्रद्धा के साथ वे भक्तों की सेवा करने लगे। उनकी वाणी निरन्तर भगवान् के नाम और गुणों का कीर्तन करने लगी। इधर देवदेवी को भी अपने पापमय जीवन से घृणा हो गयी, उसने अपनी सारी सम्पत्ति मन्दिर को भेंट कर दी और वह स्वयं सब कुछ त्याग कर श्रीरंगजी की सेवा करने लगी। इस प्रकार भक्तपदरेणु और उनकी प्रेयसी देवदेवी दोनों भगवान के परम भक्त हो गये।


 

© 2018 - All Rights Reserved