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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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Kalyad कल्याण

कल्याण
याद रखो-चित्त की धारा का प्रवाह एक भगवान् की और ही रहे, इस बालक के लिए सदा यत्नशील बने रहो ,जगत की और कहीं मुडे़. तो वह भी भगवान की ओर जाने के सीधे रास्ते की खोज में ही। कही जरा सी भी गड़बड़ी दीखे तो तुरंत प्रवाह को उस ओर से वापस मोड़ लो ।धन, जन, परिवार ,शरीर ,यश,  सम्मान -कुछ भी नही जायँगे ,परलोक में ये तुम्हारे काम नही आयेगें ,तुम्है विपत्ति से नही बचायेगें ।अतएव इनके लिए जीवन मत गँवाओ । यदि भाग्वश ये मिल गये तो सावधान रहो ,कही तुम पर इनका नशा न चढ़ जाय- तुम कही भगवान के मार्ग से हट ना जाओ; इनसे चिपटो मत , मन को सदा इनसे अलग रखने की चेष्टा करो और हो सके तो इनका भी भगवत प्राप्ति में ही प्रयोग करो ।
पता  नही शरीर का अंत कब हो जाय ,अतएव सदा तैयार रहो । जिसके आचरण शुद्व है,जिसमें सदगुणो का विकास है, जिसका मन घर में ;परिवार में ; भोगो में नही अटकता  जो मन से भगवान को नही भूलता और जो शरीर से अपने को सदा अलग ,चेतन ,नित्य और अविनाशी समझता है,बस वही तैयार है। उसे मृत्यु के समय रोना नही पड़ता ।
याद रखो- जब तक शरीर स्वस्थ है, भोग भोगने की शक्ति हैं,भोगो मे मन लगा है,मृत्यु सामने दिखाई नही देती ,तब तक अवश्य ही बहुतों को लिखी बाते अनावश्यक औेर कड़वी लग सकती है; परन्तु एक दिन  सभी को इन बातो पर विचार करना पड़ता हैं । और उस समय पहले की भूल का पछतावा बहोत ही भयानक होता है।पहले से ही विचार करके चेत जाओ तो बहोत अच्छी बात  है ।
धन, यौवन ,रूप ,पद, सम्मान, शक्ति, विद्या,वाग्मिता -सब-के-सब मौत का विकराल मुँह देखते ही विध्वस्त  हो जायेेंगे ।इन से कुछ भी नही होगा ।अतएव इनकी प्राप्ति को जीवन का उद्वेश्य मत बनाओ और प्राप्त होने पर तनिक भी अभिमान मत करो । यह चार दिनो की चाँदनी जरूर ही नष्ट हो जायगी ।
शास्त्रा, सन्त ,माहात्मा और भक्तो की वाणी अनुशीलन और अनुसरणकर भगवान पर विश्वास करो ; भगवान के महात्व  को समझो और भगवान के प्रेम  को पाने के लिए भगवान की शरण हो जाओ ।
याद रखो - काम, क्रोध, लोभ, द्वेष, हिंसा, मत्सर, अभिमान, ममत्व,आदि दोष बडे ही प्रबल हैं। इन सबको समूल नाश करने का प्रयत्न करो । सत्संग या साधना के प्रभाव से कभी-कभी मनुष्य को अपने मे इन दोषो का अभाव -सा दीखता है और वह अपने को पूर्ण मान लेता है;परन्तु इनका सर्वथा नष्ट हो जाना कठिन है। दोष दब जाते है; परन्तु संस्कार रूप से मन मे छिपे रहते है,जो अनुकूल परिस्थिति और उत्तेजक कारण उपस्थित होने पर जाग उठते  है।यही कारण है   कि सर्वथा निर्दोष समझे जाने वाले पुरूष में भी कभी-कभी इन दोषो का प्रभाव देखा जाता है।
अतएव आभिमान  से अपने को बचाते हुए बडी ही सावधानी से भगवान् के बल का  आश्रय लेकर इन दोषो को समूल नष्ट करने की चेष्टा करो ।काम ्क्रोधादिकी  जागर्तिका सबल कारण उपस्थ्ति  होने पर भी जब इनकी जागृति ना हो तब समझना चाहिए कि इनका नाश हो रहा है।ये संस्कार रूप से भी न रह जाय , इसके लिए बार-बार  आत्मपरीक्षा करके देखना चाहिए।
याद रखो- अपने द्वारा कोई अच्छा काम बन जाय तो उसके लिए भूलकर भी अभिमान मत करो । सफलता के लिए भगवान् के कृतज्ञ होओ और उन्ही शक्ति को सफलता में कारण समझो । सफलता अभिमान बहोत बाधक है । अभिमान उत्पन्न होते ही सफलता दूर भागने लगती है और किसी कारण वश ऐसा होने में देर होती है तो उसका परिणाम अभिमान की अत्यन्त वृद्वि हो जाने के कारण और भी भयानक होता है। ’शिव’ 
भगवानदीन का कोई हिस्सा नही है।भिखारी ने एक हाथ में गंगा जल लिया तथा दुसरे हाथ से अपने लड़के का हाथ पकड़.कर कहा -गंगा कसम , इन खेतो में भगवानदीन का कोई हिस्सा नही है।
सभी ने पूर्व में मना किया ,भिखारी से कसम न खाने की बात कही , परन्तु भिखारी नही माना । पंचायत समाप्त गयी । सभी ने कहा गंगा मइया देखो क्या करती  है ?
लगभग छः महिने का समय बीता ।भिखारी ने जिस एकमात्रा लडके का हाथ पकड़ कर गंगा कसम खायी थी ,रात में सोते हुए जग गया  और जोर- जोर से चिलाने लगा -दादा ! मै गंगा में डूबा जा रहा हूँ।  गंगा में डुबा जा रहा हूॅ।भिखारी ने लड़के का इलाज एंव अन्य झाड़-फूँक कराया ,परन्तु कोई फायदा नही हुआ । लड़का लगातार चिल्लाता रहता था। इसी तरह लड़का चिल्लाते-चिल्लाते एक माह में मर गया । सभी की आवाज में एक ही वाक्य था। गंगा मइया की झूठी कसम खाने का यह फल मिला है।
लड़के के मर जाने के बाद भिखारी बिलकुल पागल -जैसा हो गया  तथा वह भी चिल्लाने लगा -हाय ! मेरा बच्चा ’ चिल्लाता हुआ छः महिने में मृत्यु को प्राप्त हो गया । इस प्रकार एक परिवार का दुःखद अन्त हो गया ; क्योेंकि भिखारी के परिवार में स्वयं एवं एक लड़का  ही था । पत्नी पहले ही मर गयी थी । आज भी बुजुर्ग लोग यह प्रकरण यादकर  गंगा मइया के  न्यायकर अपना विश्वास व्यक्त करते हैं। -राम प्रसाद द्विवेदी