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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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Daya ka perdershan दया का प्रर्दश


एक राजा को दयालु कहलाने और दानवीर बनने की और अपनी प्रशंसा सुनने की बड़ी ललक लगी।एक दिन उसने ऐसा निश्चय कर के ऐसी घोषना करवा दी कोई भी पक्षी पकड़ने वाले बहेलिया दरबार में आयें वह अपने पकड़े हुए बन्दी पक्षियों का मूल्य ले कर वे उन्हें छोड़ दंे ताकि उनका घर-बार भी चलता रहे और पक्षियों को भी कोई कष्ट न होवे।
राजा की दयालुता का यश फैला। निश्चित दिन पर हजारांे पिंजड़े खाली होते और बहेलियों को राज्य कोष से धन मिलता। की£त बढ़ती गई। साथ-साथ पकड़े और छोड़े जाने वाले पक्षियों की संख्या भी बढ़ती गई।
कुछ दिनों बाद एक मनीषी मुनि वहाँ पहुँचे। उन्होने जब यह दृश्य देखा तो वह बहुत दुखी हुए। पक्षी मुक्ति समारोह समाप्त होने पर मुनि ने राजा को समझाया- ‘आपकी यश कामना इन निरीह पक्षियों को बहुत महंगी पड़ती है। लालच की पू£त के लिए असंख्य नए बहेलिए पैदा हो गए हैं और पकड़े जाने के कुचक्र में अगणित पक्षियों को त्रास मिलता है और कितने ही मर जाते हैं। यदि दयालुता को अपनाना ही है और आपको  ऐसा ही प्रदर्शन अभीष्ट है, तो आप पक्षी पकड़ने पर ही प्रतिबन्ध लगायें। 
राजा ने अपनी भूल समझी और दयालुता का प्रदर्शन छोड़ कर वह नीति अपनाई जिससे वस्तुतः दया-धर्म का पालन होता रहे।