#

One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

web page hit counter free

Mind Set माइंड सेट: आध्यात्मिकता हमारी फितरत में है

जुलाई 2009 में इटली के शहर लाक्वीला में जी 8 शिखर सम्मेलन होने से एक महीने पहले रोम में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित जी8+5 शिखर सम्मेलन में उपस्थित विकसित और विकासशील देश की सरकारों के प्रमुख के साथ कुछ पत्रकार और इस विषय के जानकार भी मौजूद थे। जैसे-जैसे कार्बन फुटप्रिंट में बढ़ोतरी हो रही है, हमारा अपराध-बोध भी उसी मात्रा में बढ़ रहा है। लेकिन सम्मेलन के दौरान मेरा मन कहीं ओर ही भटक रहा था। मैं सोच रही थी हमारी उन परंपराओं के बारे में जिन्होंने हमें जन्म से ही प्रकृति को सहेजना सिखाया है।  

 

 

बचपन में मैं अक्सर अपनी दादी के साथ बगीचे में घूमने जाया करती थी, जहां से वे अपनी पूजा के लिए रोज तुलसी की पत्तियां तोड़ कर लाती थीं। तोड़ने से पहले दादी पौधे की तीन बार परिक्रमा करतींं, कुछ श्लोक बोलतींं, मानों प्रभु से कुछ पत्तियां तोड़ने की आज्ञा ले रही हों। वे तुलसी को सींचतीं, उसका आशीर्वाद लेतीं। पर कभी जब वे थकी हुई होतीं, तो मुझे पत्तियां लाने को कह देती थीं और इस बीच वे अपने पवित्र आले में विराजमान देवी-देवताओं की छोटी-छोटी मूर्तियों को स्नान करातीं। एक शाम मैंने सोचा, क्यों न तुलसी की व्यवस्था एक दिन पहले कर लूं। मैं डिनर के बाद बगीचे में गई और वहां से तुलसी तोड़ लाई। मैंने उन पत्तियों को एक साफ कपड़े में लपेट कर फ्रिज में रख दिया। अगले दिन मैं बहुत खुश थी, मैंने बड़े विजयी भाव से उन्हें फ्रिज से निकाला। 

 

 

मेरी दादी कभी डांट-डपट नहीं करती थीं, लेकिन उस दिन मुझ पर अप्रत्याशित रूप से नाराज हो उठीं। बोलीं-‘क्या तुम्हें मालूम नहीं कि फूल-पत्तियों को रात के समय नहीं तोड़ते?’ मैंने पूछा, ‘क्यों?’  उन्होंने कहा, रात के समय निकलने वाले कीड़े काट सकते हैं। इससे भी अहम बात जो उन्होंने कही, वह यह थी कि रात में पौधे सो जाते हैं, इसलिए उन्हें रात को परेशान करना ठीक नहीं। जो वास्तविक कारण है, वह शायद अधिक विज्ञानसम्मत है। रात में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया नहीं होती, इसलिए पौधे ऑक्सीजन से अधिक कार्बनडाइऑक्साइड छोड़ते हैं। दिन में उनके संपर्क में आना अधिक ठीक है। यदि रात में पौधों और पेड़ों से अटे बगीचे के आसपास घूमेंगे, तो आप कार्बनडाइऑक्साइड अधिक ले रहे होंगे।

 

 

रात के समय बगीचे में चलने से वहां के कीट मर सकते हैं या डर कर आप पर आक्रमण कर सकते हैं। चाहे वजह कुछ भी हो, भारतीय परंपराएं पयार्वरण के प्रति काफी संवेदनशील रही हैं। जो भी प्रकृति का अनिवार्य हिस्सा है, उसे हमारे यहां पवित्र माना जाता रहा है। बच्चों को पर्यावरण-मित्रता से जुड़ी काफी शिक्षा दी जाती थी-नदी में कचरा मत फेंको , पत्तियों और शाखाओं को मत खींचो, उनके साथ प्रेम से रहो, नदी के तटों को अपवित्र मत करो, रात के समय पेड़ों के नीचे मत सोओ, रोज नहाओ। और साथ में यह आदेश रहता था, और शायद आज भी कि ‘ऐसा करें क्योंकि मैं कह रहा हूं या कह रही हूं’ या ‘ऐसा नहीं करेंगे तो भगवान दंड देंगे’। पर निश्चित रूप से ये सब निर्देश इसलिए दिए जाते थे क्योंकि अपने आसपास के प्राकृतिक परिवेश के साथ सौहार्द और मैत्री से रहने की जरूरत महसूस की गई थी। एक हाथ ले तो एक हाथ दे की भावना से। प्रकृति से लेना है, तो प्रकृति का सम्मान करना सीखें। 

 

 

प्रकृति के प्रति सम्मान का यह भाव केवल भारत में ही नहीं है, विश्वभर की परंपराओं में देखने को मिलता है। सूर्य पूजा, पानी के स्रोत और पौधों के प्रति आभार, जल-संरक्षण, पुनर्जीवन के लिए थोड़ी परती भूमि छोड़ना, यह सब लगभग सभी संस्कृतियों में आम है। साल के उस दौरान मछली पकड़ने या पेड़ काटने के लिए मना करना, जब वह समय मछलियों के प्रजनन और पेड़ों के उगने का हो। तो फिर कब  ये पवित्र भावनाएं धूमिल होती गईं, और हमारी संपूर्ण पृथ्वी पर्यावरण संकट की चपेट में आ गई? किस तरह जलवायु परिवर्तन का परिदृश्य एक खलनायक में तब्दील हो गया और हवा में प्रदूषण, पृथ्वी का विनाश, जंगलों और प्रजातियों का खात्मा और तेजी से च्लोबल वॉर्मिंग बढ़ाने लगा।

 

 

क्या होगा यदि च्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का स्तर तेजी से बढ़ेगा और हमारे सामने उस संकट का सामना करने, उसे कम करने की चुनौतियां उठ खड़ी हो जाएंगी? जानवरों का शिकार और पौधों से अपना पेट पालने के लिए निर्भर रहने की स्थिति में तो हम भूखे ही मर जाते, यदि बहुत अधिक पशुओं को मारते जाते। इससे हम ही नुकसान में नहीं रहते बल्कि पूरी पारिस्थितिकी, पूरा फूड चेन गड़बड़ा जाता। हम सोने का अंडे देने वाले हंस का खात्मा कर देते।

 

 

जब हमने जमीन को जोतना सीखा, कृषि आधारित जिंदगी जीने लगे। तब भी हम अति नहीं कर रहे थे, नहीं तो जमीन के सारे पोषक तत्वों को हम खींच लेते। लेकिन औद्योगीकरण के साथ-साथ चीजें बदलीं। अधिकांश लोग कह सकते हैं कि यह तो समय के साथ होना ही था। औद्योगीकरण से आवश्कताओं से अधिक उत्पादन संभव हुआ, पर हमारी पृथ्वी के दूसरे तत्वों के साथ हमारे रिश्ते लड़खड़ाने शुरू हो गए। तो पारिस्थितिकी का अपघटन तब शुरू हुआ जब बार्टर व्यवस्था की जगह मुद्रा और व्यापार का विस्तार हुआ। जब आर्थिक विकास की दर का आकलन ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट के रूप में होने लगा।

 

 

जब देश के विकास का आकलन संरक्षण की बजाय उत्पादन और उपभोग की मात्रा से होने लगा। जब लोगों ने उत्पादों और सेवाओं को बिना जरूरत के ही खरीदना शुरू कर दिया। जब जमीन का सदुपयोग करने की बजाय उसका शोषण होने लगा। ऐेसे में प्रकृति के साथ बेसलाइन...आधार-रेखा अधिक समय तक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व में नहीं रह सकी...इन सबने हमारी पारिस्थितिकी को बेतरह प्रभावित किया।

 

 

कुछ लोगों ने यहूदी-ईसाई धर्म के नैतिक मानदंडों (दस कमांडमेंट्स) को प्राकृतिक संसाधनों के शोषण का अनियंत्रित लाइसेंस समझ लिया, इस विश्वास से कि मानव का सृजन दूसरी सभी प्रजातियों पर प्रभुत्व जमाने के लिए हुआ है: ‘और ईश्वर ने कहा, हम अपनी कल्पना में मानव का निर्माण करें, और जब वह हमारे जैसा बन जाए, अच्छा-बुरा समझने लगे तब उन्हें समुद्र की मछलियों पर, पक्षियों पर, मवेशियों पर, पृथ्वी पर, और धरती पर रेंगने वाले हर जीव पर अधिकार करने दें।’ यहूदी संत, जो रब्बी कहलाते हैं, ने टाल्मुड (यहूदी कानून-कायदों से संबंधित संग्रह)में ‘प्रभुत्व’ शब्द की व्याख्या की है कि इसका मतलब यह नहीं है कि सभी चीजें मानव से गौण हैं, और उनका जन्म औरों पर प्रभुत्व जमाने के लिए हुआ है, बल्कि यह कि उन्हें अपने और दूसरों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी है। 

 

 

यह मानव को पशु-पक्षियों, खनिज और जीवाश्म ईंधन का उपयोग-दुरुपयोग करने का बिल्कुल अधिकार नहीं देता। हमें समझने की आवश्यकता है कि किसी चीज का कहीं शोषण तो नहीं हो रहा और हो रहा है, तो इस पर तुरंत रोक लगानी चाहिए। और रिश्तों की तरह, पारिस्थितिकी में भी संतुलन और तालमेल एक दूसरे के प्रति अपना कर्तव्य निभाने और सम्मान रखने से होता है। हालांकि यह नतीजा सब्जेक्टिव है, व्यक्तिपरक है, पर फिर भी जब लोगों की खुशियों की वजह जानने की कोशिश की गई, तो देश की जीएनपी और खुशियों के अनुपात में कोई सीधा सहसंबंध नहीं नजर आया। शायद इसलिए क्योंकि जीएनपी की दर उत्पादन और उपभोग के विस्तार पर निर्भर करती है, जबकि इंसान को खुशियां संतोष से मिलती है।

 

 

कहने का मतलब यह नहीं है कि हम वापस बार्टर व्यवस्था की ओर लौट चलें, सारी फैक्ट्रियां बंद कर दें, यातायात व्यवस्था का उपयोग न कर पैदल चलने लगें। जाहिर है, हम औद्योगीकरण से पूर्व के युग में नहीं लौट सकते और न ही जो चिकित्सकीय सुविधाएं मिल रही हैं, या आसान यातायात के साधन उपलब्ध हैं, विचारों के आदान-प्रदान के बढ़िया साधन हैं, ज्ञान और कौशल तक हमारी पहुंच है, उन्हें नकार दें। लेकिन हमें विकास और उसके उद्देश्यों को फिर से परिभाषित करने की जरूर आवश्यकता है ताकि विकास इंसान की वास्तविक प्रगति और उसके अस्तित्व की सुरक्षा के लिए हो सके, अधिक स्थाई रह सके...तकनीक को छोड़ कर नहीं, बल्कि उसके सहयोग से एक तालमेल और निरंतरता वाली जिंदगी, एक दूसरे की हिफाजत और प्यार की जिंदगी, परस्पर लाभ और संतोष की जिंदगी जी सकें।