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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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आम का मोह

आम यद्यपि पक चुका था, भला इसी में था कि किसी की तृप्ति बनता, पर वृक्ष में लगे रहने का मोह छूटा नहीं। पेड़ का मालिक पके आमों की खोज-बीन करने वृक्ष पर चढ़ा भी, पर आम पत्तों की झुरमुट में ऐसा छिपा कि हाथ आया ही नहीं।

            दूसरे दिन उसने देखा कि उसके सब पड़ोसी जा चुके, उसका अकेले ही रहने का मोह नहीं टूटा था और अब मित्रों की विरह-व्यथा और सताने लगी।

            आम कभी तो सोचताµ नीचे कूद जाऊँ और अपने मित्रों मंे जा मिलूँ, फिर उसे मोह अपनी ओर खींचता, आम इसी उधेड़बुन में पड़ा रहा।

            संशय का यही कीड़ा धीरे-धीरे आम को खाने लगा और एक दिन उसका सारा रस चूस लिया, सूखा-पिचका आम नर कंकाल के समान पेड़ में लगा रह गया।

            आम की आत्मा यह देखकर बहुत पछताईµ कुछ संसार की सेवा भी न बन पड़ी और अंत हुआ तो ऐसा दुःखद।

            इतनी कथा सुनने के बाद वसिष्ठ ने अजामिल से कहाµ “वत्स! समझदार होकर भी जो सांसारिकता के मोह में फँसे ‘अब निकलें’µ ‘अब निकलें’ सोचते रहते हैं, उनका भी अंत ऐसे ही होता है।”

            संशयग्रस्त मनःस्थिति के लोग न तो इधर के रहते हैं और न उधर के।