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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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शिष्टाचार और शालीनता की यही मांग है

विजयालक्ष्मी पंडित गांधीजी के विचारों के प्रभाव के बारें में लिखती हैं, इसके बारे में पढ़ें।

 

एक दशक पहले एक धूपभरी दोपहर में मुझे किसी ने अब तक की सबसे बेहतर सलाह दी थी और वो थे दुनिया के सबसे महानतम व्यक्ति, जिसे लोग महात्मा गांधी के नाम से जानते हैं। कई लोग जब कठिन परिस्थितियों से गुजरते हैं तो उनका मानवता के उपर से विश्वास उठ जाता है। मैं भी कुछ ऐसे ही हालात से गुजर रही थी। हाल ही में मेरे पति का देहांत हुआ था। उनके खोने के दुख के साथ-साथ भारतीय कानून की नजर में उनके बिना मेरे अस्तित्व ना होने का एहसास भी अपमानजनक था। अब मैं एक ऐसी विधवा थी जिसे संतान के रूप में बेटा नहीं था। ना तो मुझे और ना ही मेरी दोनों बेटियों को पारिवार के संपत्ति में हिस्सेदार के लिए नामित किया गया। मैंने इस दुखद स्थिति का विरोध किया। मेरे मन में परिवार के उन लोगों के प्रति कड़वाहट थी जो इस प्राचीन कानून के समर्थन में खड़े थे।

इसी दौरान मैं गांधीजी से मिलने उनके पास गई। एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए मुझे अमेरिका के लिए रवाना होना था। इसलिए उन्हें अलविदा भी कहा। 

हमारी बातचीत के बाद उन्होंने पूछा, “क्या अपने रिश्तेदारों से तुम्हारी सुलह हो गई?” मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि वो मेरे खिलाफ पक्षों की तरफदारी कर रहे थे। “मैंने किसी के साथ झगड़ा नहीं किया है”, मैंने जवाब दिया, “लेकिन मैं उनके साथ भी नहीं हूं जो एक घिसे हुए कानून का लाभ उठाकर मेरे लिए शर्मनाक और मुश्किल परिस्थिति पैदा कर रहे हैं”। गांधीजी एक पल के लिए खिड़की से बाहर देखने लगे। फिर वो मेरी तरफ मुड़े और मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हें जाना होगा और उन्हें अलविदा कहना होगा, क्योंकि शिष्टाचार और शालीनता की यही मांग है। भारत में हम अब भी इन चीजों की महत्ता से जुड़े हुए हैं।” “नहीं,” मैंने घोषणा करते हुए कहा। “मैं आपकी भी खुशी के लिए उनलोगों के पास नहीं जाउंगी जो मुझे नुकसान पहुंचाने की इच्छा रखते हैं।” “तुम्हें तुम्हारे अलावा कोई और नुकसान नहीं पहुंचा सकता है”, उन्होंने कहा। वो अब भी मुस्कुरा रहे थे। “मैंने तुम्हारे दिल में बहुत कड़वाहट देखी है जो तुम्हें नुकसान पहुंचा सकती हैं।” मैं चुप थी। वो कहते रहे, “तुम एक नये देश जा रही हो क्योंकि तुम खुश नहीं हो और यहां से दूर जाना चाहती हो। लेकिन क्या तुम खुद से भाग सकती हो? क्या तुम्हें बाहर कहीं भी जाकर खुशी मिलेगी अगर तुम्हारे दिल में कड़वाहट है? इसके बारे में सोचो। थोड़ी विनम्र बनो। तुमने अपने एक प्रिय को खो दिया है। उसका दुख ही तुम्हारे लिए पर्याप्त है। तुम्हें भविष्य में अवश्य दुख मिलेगा क्योंकि तुममें अपने दिल को साफ रखने का साहस नहीं है।”

उनके शब्दों ने मुझपर कोई असर नहीं डाला। उन शब्दों से मुझे कोई शांति नहीं मिली। काफी संघर्ष के बाद मैंने आखिरकार अपने देवर को फोन किया और उनसे कहा कि यहां से जाने से पहले मैं उनसे और उनके परिवार से मिलना चाहती हूं। मैं उनके साथ पांच मिनट भी नहीं रही, कि मुझे एहसास हुआ कि मेरे मिलने से हर किसी को राहत महसूस हुई थी। मैंने उन्हें अपने आगे की योजना बताई और उनसे अपने जीवन के अगले पड़ाव के लिए शुभकामनाएं भी मांगी। इन सबका मुझपर एक चमत्कारी प्रभाव हुआ। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मेरे उपर से एक बोझ हट गया था और मुझे खुद में एक आजादी सी महसूस हुई। यह छोटा सा कदम मुझमें एक महत्वपूर्ण बदलाव की एक शुरुआत थी।

 

हाल ही में मेरे साथ कुछ हुआ। सम्मानीय मेहमान के रूप में ग्रेट ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और लेडी ईडन शायद मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। युनाईटेड किंगडम में भारत के हाई कमिश्नर के तौर पर मैंने मेन्यू, फूलों और केंडल्स तक की योजना सावधानी पूर्वक बनाई। जब मेहमान पहुंचे और दो बार पेय सर्व कर दिया गया, तो मैंने बटलर को रात के खाने की घोषणा का संकेत दिया। लेकिन हम अब भी इंतजार कर रहे थे। जब तीसरी बार भी केवल पेय ही सर्व किया गया तो मैंने सबसे नम्रतापूर्वक मांफी मांगी और नीचे किचन की ओर दौड़ी। मेरे सामने का दृश्य काफी हैरान कर देने वाला था। किचन के एक कोने में डरी हुई किचन की नौकरानी खड़ी थी और दूसरे कोने में घर की देखभाल करनेवाला। सामने मेज पर हाथ में करछुन लहराता हुआ मेरा कुक बैठकर गुनगुनाते हुए समय बिता रहा था। उसकी आंखे नशे में चमक रही थी। टेबल पर मुर्गी के कुछ टुकड़े बिखड़े पड़े थे। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे घुटने अब मेरा साथ नहीं दे रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद मैंने उनसे उनसे सामान्य आवाज में पूछा, “अब तक खाना तैयार क्यों नहीं हुआ है?” “लेकिन यह तैयार है मैडम”, मेरे कुक ने कहा। “सब तैयार है। सभी बैठ जाएं, बैठ जाएं...”

 

मैं काफी गुस्से में थी। मेरे दिल में आया कि कहूं, “बाहर निकल जाओ। तुम्हें काम से निकाला जाता है!” लेकिन फिर मैंने उस सलाह के बारे में सोचा जिसने कई बार मेरे गुस्से को शांत किया था। अगर मैं अपना आपा खोती हूं तो मैं केवल खुद को नुकसान पहुंचाउंगी। मैंने खुद को समझाया। “टेबल पर परोसने के लिए कुछ तो सोचना है,” मैंने कहा। सबको मैंने खड़ा किया। टेबल पर मेन्यू के अनुसार खाना तो सर्व नहीं किया गया पर जब मैंने मेहमानों को बताया कि क्या हुआ था तो सभी आश्चर्यचकित थे। “तो अगर आपका कुक नशे में हो तो वो आपको खाने में यह परोसेगा,” किसी ने मजाक में कहा। “अगर वह सामान्य हो तो वो क्या परोसेगा!” उन ठहाकों में मुझे राहत पहसूस हुई। मुझे महसूस हुआ कि हालांकि वह डिनर पार्टी मेरे लिए महत्वपूर्ण थी लेकिन वह मेरे अस्तित्व की धूरी नहीं थी।

 

अपनी भावनाओं को समान अनुपात में बनाए रखने के लिए हर किसी को अपने दिल से नफरत को खत्म कर देना चाहिए। भले हम सब कोई भी काम करते हों, लेकिन हम सबों के लिए गांधीजी की यह सलाह अर्थपूर्ण है, “तुम्हें तुम्हारे सिवाय कोई हानि नहीं पहुंचा सकता है।”

 

(विजयालक्ष्मी पंडित ने यह आर्टिकल 1955 में डाइजेस्ट के लिए लिखा था, जब वो युनाईटेड किंगडम में भारत की उच्चायुक्त थी।)