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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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पवित्रता जल में नहीं, बल्कि तुम्हारी चुप्पी में थी

विवेक देसाई कहते हैं कि जितनी ज्यादा आप शब्दों की ताकत समझेंगे, उतना ही अधिक चुप्पी की ताकत भी आपको समझ आयेगी।

 

इंटरनेट के युग में हम अक्सर भाषाओं या शब्दों की ताकत को महत्व नहीं देते। यह छोटी सी कहानी शब्दों की ताकत को बयां करती है। एक बार एक महिला एक साधु के पास पहुंची। उनसे साधु से पूछा, “हे साधु! जैसे ही मेरे पति काम से घर लौटते हैं, वो अपना सारा गुस्सा मुझपर निकालना शुरु कर देते हैं। ऐसी परिस्थिति में मैं भी गुस्से में प्रतिक्रिया देती हूं जो हालात को और खराब कर घरेलू हिंसा तक पहुंचा देते हैं। यह दिनों-दिन और भी बुरा होता जा रहा है। अब तो पड़ोसी भी इसके बारे में शिकायत करने लगे हैं। क्या आपके पास इसका कोई उपाय है? साधु ने विश्वास के साथ जबाव दिया, “हां” और पेड़ के नीचे रखे पानी के बर्तन को झुकाते हुए कहा, “यह पवित्र जल है। जैसा ही तुम्हारा पति क्रोधित होने लगे, इस पानी को अपने मुंह में भर लेना और इसे तब तक नहीं निगलना जबतक उसका गुस्सा शांत ना हो जाये।”

उस औरत ने ऐसा ही किया। कमाल की बात यह थी कि यह काम भी कर गया। 

जैसे ही हिंसा रुकी, पड़ोसियों ने भी शिकायत करना बंद कर दिया और कुछ दिनों बाद घर में केवल शांति बसने लगी। एक दिन वह पवित्र जल खत्म हो गया और उसे वापस से लेने महिला दौड़ती हुई साधु के पास जा पहुंची। उसने हर्षपूर्वक साधु को समाधान की सफलता के बारे में बताया और उनसे और पवित्र जल मांगा। इस बात पर साधु मुस्कुराने लगे और सच्चाई बताते हुए महिला को कहा, “पवित्रता जल में नहीं थी बल्कि तुम्हारी चुप्पी में थी।” उस जल को मुंह में भरकर वह अपने शब्दों को अंदर और बाहर दोनों रूप से जन्म लेने से रोकती थी।

 

चुप्पी ही उपचार है

हर व्यक्ति अपने शब्दों के प्रयोग से अपने संसार का निर्माण करता है। दूसरों से बातचीत में शब्दों का आदान-प्रदान और विचारों में स्वयं के साथ शब्दों का आदान-प्रदान ही उसे जीवन या संसार से मिले अनुभव को जन्म देता है। इसके अलावा हम खुशनुमा शब्दों का इस्तेमाल कर किसी का दिन अच्छा बना सकते हैं या कड़े शब्दों का इस्तेमाल कर बुरा। एक पुरानी कहावत है, “छड़ी या पत्थर मेरी हड्डियों को तोड़ सकते हैं लेकिन शब्द मुझे किसी भी प्रकार का चोट नहीं पहुंचा सकता।” यह सच है लेकिन सिर्फ कहने में आसान है करने में नहीं। हम अक्सर शब्दों से चोट खाते हैं और दिखा नहीं पाते। हालांकि, शब्दों की ताकत के बारें में थोड़ी सी जागरुकता भी किसी के संसार में या उसके आस-पास की दुनिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।

 

शब्द अक्षरों से बने होते हैं और अक्षर कुछ और नहीं बल्कि ध्वनि कंपन है। अगर शब्द भगवान की तरह शक्तिशाली होते तो ये अक्षर ही भगवान की ताकत का कारण होते। शब्दों का यही महत्व है। समस्या शब्दों में नहीं होती बल्कि उसके वास्तविक प्रकृति की अज्ञानता के कारण होती है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि हमें दैनिक कामों में इन शब्दों की आवश्यकता होती है लेकिन जब हम उसकी ताकत को समझ लेते हैं तो हम सावधानी के साथ सुनना और बुद्धिमत्ता के साथ उसका प्रयोग करना सीख जाते हैं। वास्तव में, हमारे जीवन में एक तीखी जुबान और लापरवाह श्रव्यता के कारण सारी समस्याएं होती है। दिलचस्प बात यह है कि शिव सूत्र में प्रयुक्त संस्कृत शब्द ‘मातृका’ शब्दों की ताकत का वर्णन करता है और इसका अर्थ होता है 'छोटा गर्भ’। जब शब्द की ताकत समझ में आ जाती है तो ये शब्द मंत्र की तरह महसूस होते हैं जिसकी ध्वनि दिव्य होती है। संस्कृत शब्द ‘मंत्र’ का अर्थ है शब्दों से रक्षा करना और जब किसी की रक्षा शब्दों से हो जाती है तो वह दूसरों की दी हुई पीड़ा से भी बच जाता है। यह उसे चोट पहुंचाने के बजाय उसका उपचार करती है। जितना अधिक आप शब्दों की ताकत को समझ पायेंगे, उतना ही अधिक आप चुप्पी की ताकत को भी समझ पायेंगे। चुप्पी वह स्रोत है जहां सभी शब्दों का जन्म होता है और जहां सभी शब्द घुल भी जाते हैं। इन सबके बाद क्या चुप्पी से बढ़कर कुछ भी उपचारात्मक या ताकतवर है?