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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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दरवेश कौन है?

एक बार गुरु नानक पानीपत गए, जहाँ शाहशरफ नामक एक प्रसिद्ध सूफी फकीर रहते थे। गुरु नानक उस समय गृहस्थियों वाले वस्त्रा धारण किए हुए थे। यह देखकर शाहशरफ ने पूछाµ “फकीर होकर आपने गृहस्थियों वाले कपड़े क्यों पहन रखे हैं और संन्यासियों की तरह आपने अपना सिर क्यों नहीं मुड़ा रखा है?”
    नानक ने उत्तर दियाµ “मूड़ना मन को चाहिए, सिर को नहीं और मिट्टी की तरह नम्र होकर ही मन का मूड़ा जा सकता है।” अपने वेश के संबंध में उन्होंने कहाµ “जो मनुष्य परमेश्वर के दर पर अपने सुख, स्वाद और अहंकार को त्याग कर गिर पड़े, वह जो भी वस्त्रा धारण करे, परमात्मा उसे स्वीकार करता है। दरवेश का चोंगा और टोपी यही है कि वह ईश्वरीय ज्ञान को अपनी आत्मा में बसा ले। जो कोई मन जीत ले, सुख-दुःख में एक समान रहे और हर समय सहजावस्था में विचरण करे, उसके लिए हर तरह का वेश शोभनीय है।”
    जब शाहशरफ ने पूछाµ “आपकी जाति क्या है, आपका मत क्या है, गुजर कैसे होती है?” गुरु जी ने कहाµ “मेरा मत है सत्यमार्ग, मेरी जाति वही है जो अग्नि और वायु की है, जो शत्राु-मित्रा को एक समान समझती है। मेरा जीवन वृक्ष-धरती की तरह है। नदी की तरह मुझे इस बात की चिंता नहीं कि मुझ पर कोई धूल फेंकता है या फूल और मैं जीवित उसी को समझता हूँ जिसका जीवन चंदन के समान दूसरों के लिए घिसता हुआ संसार में अपनी सुगंध फैला रहा हो।”
    यह सुनकर शाहशरफ ने कहाµ ”दरवेश कौन है?“ नानक ने कहाµ “जो जिंदा ही मरे की तरह अविचल रहे। जागते हुए सोता रहे, जान-बूझकर अपने आप को लुटाता रहे। जो क्रोध में न आए, अभिमान न करे। न स्वयं दुखी हो, न किसी को दुःख दे। जो हमेशा ईश्वर में मग्न रहे और वही सुने जो उसके अंदर से ईश्वर बोलता है और उसी सर्वांतर्यामी परमात्मा को हर व्यक्ति हर स्थान में देखे।”