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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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गुरु दक्षिणा 


पुरानी कथा है, एक ऋषि थे। वे लोगों का ध्यान प्रभु की ओर लगाया करते थे। जब लोग उनके आश्रम में आते, तो वे उन्हें अध्यात्म के रास्ते पर चलना सिखाते थे। अपने शिष्यों को रूहानियत के बारे में बताया करते थे। जब शिष्यों की शिक्षा पूरी हो जाती थी और वे अपने घरों को वापस जाने लगते थे, तो वे ऋषि से पूछते कि गुरु-दक्षिणा में क्या दें? तो ऋषि कहा करते थे कि जो तुमने पाया है, तुम दुनियां में जा कर उस पर अमल करो, अपने पैरों पर खड़े होओ, सच्ची कमाई करो और फिर एक साल के बाद तुम्हारा जो दिल चाहे वह दे जाना। शिष्य जब आश्रम छोड़कर जाते थे, तो उनमें से कोई एक पेशे में जाता था, कोई दूसरे में। अपने पेशे, अपने कामकाज से जिसे जो कमाई होती थी, उसमें से वे शिष्य श्रद्धापूर्वक कुछ हिस्सा उन्हें दे दिया करते थे। एक बार गुरुकुल में एक सीधा-सादा शिष्य आया। वह गड़रिया था, भेड़ों को चराया करता था। लेकिन उसके अंदर प्रभु को पाने की तीव्र इच्छा थी। ऋषि उसे प्रेम से पढ़ाया करते थे। उसको जो भी सबक दे देते थे, अगले दिन आकर उन्हें वह पूरा सबक सुना देता था। जो कुछ उसे सिखाया जाता था, उस पर पूरे मनोयोग से अमल करता था। जब उसकी शिक्षा पूरी हुई तो उसने भी ऋषि से पूछा, गुरु दक्षिणा में क्या दूं? ऋषि ने उससे भी यही कहा कि दुनिया में जाओ, अपने पैरों पर खड़े होओ, जो तुमने सीखा है, उस पर अमल करो और फिर एक साल बाद जो चाहो, उसे दक्षिण में दे जाना। गड़रिया चला गया। एक साल बाद गुरु के पास लौटा और श्रद्धा से बोला, दक्षिणा देने आया हूं। ऋषि उसे देखकर बड़े खुश हुए, क्योंकि वह उनको अच्छा लगता था, उसका ध्यान प्रभु में बहुत हुआ करता था। फिर पूछा, क्या लेकर आए हो बेटा?
    गड़रिया ने पचास लोगों को खड़ा कर दिया, जो उसके गांव के थे। उसने कहा, मैं गुरु दक्षिणा में ये पचास नए शिष्य आपके लिए ले आया हूं। ऋषि ने पूछा, पचास लोग किसलिए? तो उसने कहा, जो शिक्षा आपने मुझे दी थी, मैंने उसे इन तक पहुंचाया। उतने से ही इनका जीवन संवर गया। अब आप गुरु दक्षिणा में इन सबको अपना शिष्य बना लें, ताकि इतने लोग और आपके बताए रास्ते पर सही तरीके, से चल सकें। ऋषि बहुत खुश हुए और कहा, तुमने मुझे सबसे अच्छी गुरु दक्षिणा दी है।
    गड़रिया जानता था कि उसके गुरु दूसरों में क्या बाँटना चाहते हैं। साधारण जन सब सत्संग में जाते हैं तो यह नहीं जानते कि वहाँ संत उन्हें क्या देना चाहते हैं। वे उनसे अपने मन की चीजें पाना चाहते हैं। दोनों में से किसी का मनोरथ पूरा नहीं होता।