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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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उदार भावनाओं


“बेटा! ले, ये दो टुकड़े मिठाई के हैं। इनमें से यह छोटा टुकड़ा अपने साथी को दे देना।”
“अच्छा माँ!” और वह बालक दोनों टुकड़े लेकर बाहर आ गया अपने साथी के पास। साथी को मिठाई का बड़ा टुकड़ा देकर छोटा स्वयं खाने लगा। माँ यह सब जंगले से देख रही थे। उसने आवाज देकर बालक को बुलाया। 
    “क्यों रे! मैंने तुझसे बड़ा टुकड़ा खुद खाने और छोटा उस बच्चे को देने के लिए कहा था, किंतु तूने छोटा स्वयं खाकर बड़ा उसे क्यों दिया?”
    वह बालक सहज बोला में बोलाµ “माँ! दूसरो को अधिक देने और अपने लिए कम से कम लेने में ही मुझे अधिक आनंद आता है।”
    माँ गंभीर हो गई। वह बहुत देर विचार करती रहीµ बालक की इन्हीं उदार भावनाओं के संबंध में। उसे लगा, सचमुच यही मानवीय आदर्श है और इसी में विश्वशांति की सारी संभावनाएँ निहित हैं। मनुष्य अपने लिए कम चाहे और दूसरों को अधिक देने का प्रयत्न करे तो समस्त संघर्षों की समाप्ति हो कर स्नेह-सौजन्य की स्वर्गीय परिस्थितियाँ सहज ही उत्पन्न हो सकती हैं।