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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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रोपे बिरवा नीम को, आम कहां ते होय

रोपे बिरवा नीम को, आम कहां ते होय
अक्सर लोग नई पीड़ी के हिंसक और क्रोधी होने की शिकायत करते हैं और ऐसा आभास देते हैं मानों नई पीढ़ी अपने आप हिंसक होती जा रही है। वे न तो अपने क्रोध के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हैं और न ही नई पीढ़ी के हिंसक व्यवहार के लिए। यह गलत है। हिंसा और क्रोध कोई पारलौकिक कर्म नहीं है; इन्हें हम सब अपने व्यवहार से उत्पन्न करते हैं और पालते-परोसते हैं।
    यह सुनने में कुछ अजीब-सा लगेगा; किंतु सत्य पहले सुनने में अटपटा-सा ही लगता है। जैसे-जैसे हम उसके निकट जाते हैं, वह स्पष्ट दिखने लगता है।
    मैंने अनेक विद्या£थयों से पूछा कि महावीर और बुद्ध के विचारों के विषय में क्या जानते हो? कुछ ने कहा कि वे इन लोगों को बिल्कुल ही नहीं जानते, नाम ही नहीं सुना है। कुछ ने कहा कि उन्होंने अपने माता-पिता का ेइन लोगों की तस्वीरों के आगे नतमस्तक होते देखा है, पर उनकी शिक्षाओं के विषय में नहीं जानते। और कुछ ने कहा कि वे महापुरुष थे। बात केवल इन दो महापुरुषों के संबंध में नहीं है। ऐसा लगभग सभी विराट चेतनाओं के विषय में है। हमारी संस्कृति के आधार स्तंभों को हमारी वर्तमान पीढ़ी नहीं के बराबर जानती है। आपको सहजता से विश्वास नहीं आएगा। साठ के दशक से पहले की आबो-हवा में महापुरुषों की उपस्थिति घुली-मिली थी। माता-पिता और घर के बड़े-बूढ़े खूब लोरी और प्रेरणादायी कहानियां सुनाया करते थे। हमारे नेताओं और अफसरों का चरित्रा भी महापुरुषों जैसा ही था।
    अपने उन महापुरुषों के बचपन पर जब हम दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि उनका जीवन भी अहिंसा और प्रेम से लबालब भरा हुआ था। वे सभी इस संसार के प्रति करुणा से भरे हुए थे। दूसरों को दुख देना तो कल्पना से परे की बात थी, उन्हें दूसरों के दुख में काम आने की ही शिक्षा दी गई थी। उनकी पे्ररक कथाएं हमारे हृदय को अपने स्पर्श से कोमल करती हैं।
    किंतु हमारा वर्तमान वैसा नहीं है। भौतिक संसाधनों के रूप में हमने चाहे जितनी प्रगति कर ली हो; किंतु संस्कारित होने के मामले में हम पिछड़ रहे हैं। बाल और किशोर मन की भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए अब काम ही कहां हो रहा है? उसकी भूमि पर अहिंसा, प्रेम, दया और करूणा के बीज ही कहां बोए जा रहे हैं?
    और जब बीज ही नहीं बोए जा रहे तो फिर फसल कहां से उगेगी? हाँ, उस बंजर पड़ी भूमि पर कुछ कंटीले और जहरीले जंगली झाड़-झंखाड़ अवश्य उग आए हैं उनके कांटे टूट-टूट कर रास्तों पर गिरते जा रहे हैं। उन कांटों से पथ पर चलनेवाली मानवता कष्ट पा रही है। उनके बाल मन के लिए हिंसा से भरी कार्टून फिल्में दिखलाई जा रही हैं।
    एक बच्चे को मैंने कम्प्यूटर पर कार रेस का खेल खेलते देखा। वह बहुत तेज गति से अपनी कार चला रहा था और अपने रास्ते में आनेवाले बच्चों, बूढ़ों और सभी प्रकार के प्राणियों को कुचलता जा रहा था। अवसर मिलने पर वह अपने हथियारों से उनको मार भी रहा था। आकाश में जाते हवाई जहाज पर भी उसने गोलियां चलाईं और उसको नष्ट होते देख कर बहुत प्रसन्न हुआ। 
    मैंने उससे पूछा कि यह सब क्या है। उसने बताया कि इस खेल का नियम यह है कि मैं जितने अधिक आदमियों को मारूंगा, मुझे उतना अधिक धन मिलेगा। उसके मन से, दूसरे को मारने से होने वाले दुख के कोमल तंतु नष्ट हो गए। अब उसके अवचेतन मन में एक बात बैठ गई कि दूसरे को मारने से धन मिलता है।
    फिर वह किशोर होता है। तब हिंसा और मारधाड़ से भरपूर फिल्में उसका बेताबी से इंतजार कर रही होती हैं। बचपन में पड़े हिंसा के बीजों को यहां खूब खाद-पानी मिलता है, और हमारे सामने तैयार खड़ी होती है- हिंसा की लहलहाती, जीभ लपलपाती विषैली संस्कृति। सच ही कहा हैः-
    रोपे बिरवा नीम को, आम कहां ते होय।