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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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सच्चा तपस्वी 

महाराज रंतिदेव की प्रचंड तपश्चर्या से जब इंद्रासन हिल उठा तो प्रजापति को उनके सामने प्रकट होकर वरदान देने के लिए बाध्य होना पड़ा उन्होंने कहा “तुम्हारी तपश्चर्या से मैं अत्यधिक प्रसन्न हूँ। चाहो जो वरदान माँग लो।“ महाराज बोले “देवराज! मैं चाहता हूँ मेरे राज्य में ही नहीं, समस्त पृथ्वी पर कोई भूखा न रहे, कोई पीड़ित-शोषित, धनहीन न रहे। प्रचुर अन्न-धन से सबके भंडार भरे रहें। पृथ्वी हिरण्यगर्भा हो। जन-जन के मन में बैर, ईष्र्या, द्वेष, कलह व दुर्भावनाओं का नाम निशान न रहे। पारस्परिक आत्मीयता व सौहार्द्र बढ़े। कोई रोगी न हो, दुखी न हो। यह मेरा कत्र्तव्य है और मुझे इस कत्र्तव्य के पालन की शक्ति दीजिए।“
    महाराज ने तप के बदले अपने लिए कुछ भी न माँगा, सब कुछ जनकल्याण के लिए माँगा। यह सच्चे तपस्वी की अनूठी मिसाल है। भगवान से लौकिक सुख-सुविधाएँ माँगने की अपेक्षा कत्र्तव्यपालन की क्षमता माँगना ही संगत है।