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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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प्रभु की कृपा 

प्रभु की कृपा 
सन् 1995-97 ई॰ की बात है। आकाशवाणी में सेवारत रहने के कारण केन्द्र-सरकार द्वारा प्रदत्त सुविधा का लाभ उठाते हुए मैंने एल॰टी॰सी॰ यात्रा पर जाने का निश्चय किया। भोपाल से काठमाण्डू जानेवाली एक टूरिस्ट बस में मुझे रिजर्वेशन भी मिल गया। मेरे माता-पिता, पत्नी और दो छोटे बच्चे शुभम् और प्रियम् साथ में थे। मई-जून की भीषण गर्मी थी। छिन्दवाड़ा से रायपुर तक तो सब ठीक-ठाक रहा, किंतु रायपुर से उड़ीसा के लिये प्रस्थान करते समय मेरे चारवर्षीय पुत्र प्रियम् का बुखार-सा महसूस हुआ। सम्भलपुर पहँुचते-पहँुचते बुखार तेज हो गया। मेरे पिताजीने पास रखी दवाइयों से उसका उपचार आरम्भ किया; किंतु 2-3 दिनों तक उपचार करने पर भी उसे कोई लाभ नहीं हुआ। इसी बीच घूमते-घूमते हम कलकत्ता और वहाँ से सिलीगुड़ी पहुँच गये थे। सिलीगुड़ी से काठमाण्डू के लिये प्रस्थान करते समय प्रियम् के शरीर में दाने-दाने से उभर आये। मैंने काठमाण्डू से गोरखपुर पहुँच कर उसे डाक्टर को दिखाया। डाक्टर ने कहा-ये चिकनपाक्स है और पूरा कोर्स होने के बाद ही पीछा छोड़ेगा। अब प्रियम् बहुत परेशान करने लगा था। कमजोर भी बहुत हो गया था। मेरी पत्नी और माँ उसकी बहुत चिन्ता करने लगीं। घूमने का उत्साह कम हो गया। इसी तरह बीमार प्रियम् को लेकर हमारी बस बनारस में एक दिन रुककर चित्रकूट पहुँची। चित्रकूट में उसकी हालत काफी खराब थी। न वह पैदल चल पा रहा था,  न फुन्सियों में दर्द के भय से गोद में आ रहा था। मैंने मन्दाकिनी नदी के किनारे बने मन्दिरों में उसे घुमाने की कोशिश की ; किंतु वह लगातार रोता रहा। बड़ी मुश्किल से एक-एक सीढ़ी चढ रहा था। जैसे-तैसे एक मन्दिर के अन्दर हम पहुँचे तो वहाँ वनवासी-वेश में भगवान् राम, माँ सीता और लक्ष्मणजी की प्रतिमाएँ देखकर मेरा हृदय भर उठा।
मैंने कहा-प्रभु, छोदे से बच्चे की यह कैसी परीक्षा है ? और कुछ देरतक मेरे आँसू लगातार बहते रहे। मैं प्रभु के सामने आर्तभाव से खड़ा रहा। इसी बीच उस मन्दिर में जप कर रहे एक साधुबाबा ने हमें चरणामृत दिया और हम मन्दिर से वापस लौटे। मन्दिर से लौटते ही आश्चर्य से मैंने देखा कि प्रियम् ने रोना बन्द कर दिया है और लगभग सामान्य-जैसी गति से मन्दिर की सीढ़ियाँ उतर रहा है। उसकी पीड़ा जैसे बहुत कम हो गयी थी। थोड़ी देर में  वह आसपास के दृश्य को जिज्ञासु भाव से देखने लगा और  चित्रकूट के बन्दरों को देखकर खुश भी होने लगा। उसके बाद तो हमारे छिन्दवाड़ा वापस आने तक प्रियम् ने हमें परेशान नहीं किया। यहाँ तक कि मैहर में माँ शारदा देवी के मन्दिर की सीढ़ियाँ भी उसने उत्साह से चढ़ी। हालाँकि छिन्दवाड़ा आने के बाद भी उसे पूर्णतया ठीक होने में लगभग एक माह लग गया, किंतु चित्रकूट के उस मन्दिर मन्दिर में दर्शन के बाद क्षणभर में अचानक उसमें जो परिवर्तन मैंने देखा था, उसे यादकर आज भी मेरा मन प्रभु के प्रति कृतज्ञता से भर उठता है। चित्रकूट के उस मन्दिर में विराजमान प्रभु की वे मूर्तियाँ आज भी मेरी आँखों के सामने नाचती रहती रहती हैं। 
आभार कल्याण  अवधेश तिवारी