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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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उपदेश पाने का अधिकारी

एक बार मह£ष याज्ञवल्क्य अपने आश्रम में शिष्यों सहित विराजमान थे। सत्संग का समय हो चुका था, परन्तु किसी कारणवश राजा जनक उपस्थित नहीं हो सके थे। उनकी प्रतीक्षा में उन्होंने अपना प्रवचन आरम्भ नहीं किया। एक आलोचना-प्रिय संन्यासी शिष्य ने अपने पास बैठे गुरु भाई के कान में फुसफुसा कर कहा ‘महापुरुष भी वैभव-सम्पन्न शिष्यों की ओर अधिक आक£षत होते हैं।’ यद्यपि उसने यह बात बड़ी सावधानी से कही थी पर मह£ष की पैनी दृष्टि से यह बात छिप न सकी। त्रिकालज्ञ मह£ष अपने कुतर्की शिष्य की मुख-मुद्रा से उसकी अन्तर्भावना को ताड़ गए। कुछ ही समय पश्चात राजा जनक पधारे। मह£ष ने उन्हें विशेष सत्कार से आसन दिया। ईष्र्यालु शिष्यों की ईष्र्याग्नि में एक और आहुति पड़ी। मह£ष ने प्रवचन आरम्भ किया। राजा जनक समाधिस्थ हो कर उनके उपदेश को सुनने मं तल्लीन हो गए। अन्य शिष्यों का ध्यान कहीं और था।

सहसा एक नौकर ने आकर राजा के कान में कुछ कहा। राजा ने उसे मौन रहने का संकेत दिया। फिर कुछ देर बाद एक और सेवक दौड़ा हुआ आया और राजा जनक के समीप आकर धीरे से कहा महल क उत्तर भाग में आग लग गई ’ जनक ने उसे भी मौन रहने का संकेत दिया। यह बात पास बैठे एक शिष्य ने सुन ली। एक ने दूसरे को दूसरे ने तीसरे को यह बात बतलायी। शिष्यों में कानाफूसी हुई और एक-एक कर शिष्यगण उठते गए- अपनी कुटियों में लंगोटी अँचला और आसन बचाने के लिए। अब वहाँ श्रोता राजा जनक और वक्ता मह£ष रह गए। लौटने पर मह£ष ने उस आलोचक शिष्य से पूछा- तुम कहाँ गए थे

मह£ष के स्वर में तीव्रता थी। गुरुदेव की क्रुद्ध मुद्रा देखकर शिष्यगण सहम गए और कुछ न बोले।

‘तुम सब अपने बहुमूल्य वस्त्रा कमंडल आदि बचाने गए थे और यह जनक की सम्पत्ति तो शायद तुम्हारी लंगोटी के बराबर मूल्य की भी नहीं।