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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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आदर्श शिष्य     

दण्डी स्वामी अपनी विद्वता के लिए प्रसिद्ध थे। वह सत्य के पक्षधर थे और पाखंड तथा मिथ्याभिमान से दूर रहते थे। मथुरा स्थित उनके आश्रम में शिक्षा पाने के लिए दूर-दूर से हर वर्ग के लोग आते थे। उनके शिष्यों में दयानंद भी थे। वैसे तो सभी शिष्य मिलकर आश्रम का काम करते थे मगर दयानंद पर कुछ ज्यादा ही बोझ था। उनसे ज्यादा काम लिया जाता था। खाने मंे भी उन्हें भुने चने और गुड़ मिलते थे और रात में पढ़ने के लिए प्रकाश की भी सुविधा नहीं मिलती थी। जबकि दूसरे शिष्यों को कई तरह की सहूलियतें मिली हुई थीं। स्वामी जी के शिष्य उनके इस सौतेले व्यवहार से आश्चर्यचकित रहते थे। वे आपस में उनके इस आचरण की निंदा भी करते थे, हालांकि दयानंद को गुरु की आलोचना पसंद नहीं आती थी। वह सदैव प्रसन्नचित रहते और गुरु की आज्ञा का खुशी-2 पालन करते थे।
    एक बार एक विद्यार्थी ने डरते-डरते स्वामी जी से पूछ ही लिया, ‘गुरुदेव ! दयानंद भी हमारी ही तरह आपके शिष्य हैं पर आप हमारे साथ तो अच्छा व्यवहार करते हैं पर उनके साथ नहीं।’ मगर दण्डी स्वामी ने इसका काई जवाब नहीं दिया। वह मौन रह गए। एक दिन स्वामी जी ने अपने शिष्यों के बीच शास्त्रार्थ कराने का निर्णय किया। उन्होंने सभी शिष्यों को बुलाया और एक विषय देकर उस पर बहस करने को कहा। लेकिन उन्होंने सारे  शिष्यों को एक तरफ और दयानंद को अकेले दूसरी तरफ बिठाया। शास्त्रार्थ शुरू हुआ। दयानंद सभी पर भारी पड़ गए। तब दण्डी स्वामी ने शिष्यों से कहा, ‘देखा आप लोगों ने, दयानंद अकेला आप सब से लोहा ले सकता है क्योंकि वह सच्चे मन से हर काम करता है। उसमें लेशमात्रा भी भय, ग्लानि, संकोच, लालच और द्वेष नहीं है। मैं दयानंद को अधिक कष्ट देता था क्योंकि मैं कष्ट सहने की उसकी क्षमता को बढ़ाना चाहता था। दयानंद खरा सोना है और सोने को आग में तपाना आवश्यक था। ’ यही दयानंद आगे चलकर दयानंद सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुए।