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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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सिर्फ अच्छा होना ही पर्याप्त नहीं

सिर्फ अच्छा होना ही पर्याप्त नहीं
    कहा गया है कि केवल वही व्यक्ति आलसी और कामचोर नहीं हैं जो कार्य नहीं करता, बल्कि वह भी है जो अच्छा है और ज्यादा कार्य कर सकता है, लेकिन करता नहीं। किसी समाज या देश को कौन खराब करते हैं? अच्छे लोग या बुरे लोग? ऊपरी तौर पर तो यही लगता है कि बुरे लोग ही समाज को कमजोर बनाते हंै। लेकिन वास्तव में अच्छे लोग भी अपने समाज या राष्ट्र को कमजोर बनाते हैं। तो क्या अच्छाई का दामन छोड़ कर बुराई का दामन थाम लिया जाए, जिससे समाज का भला हो सके? नही, ऐसी बात नहीं है। समाज के उत्थान और निर्माण में जो लोग कुछ नहीं कर सकते उनकी अपेक्षा जो लोग कुछ कर सकते हैं उनके परिश्रम और योगदान की ही आवश्यकता होती है। जो लोग कुछ नहीं करते, उनसे किसी योगदान या सहयोग की उम्मीद करना ही बेकार है। जो अच्छे हैं, वही कुछ करते हैं, इसलिए जब वे निष्क्रिय बैठ जाते हैं तो समाज का कहीं ज्यादा अहित होता है। 
    समाज में अनेक लोग अच्छे होते हैं। अनेक लोग बहुत अच्छे भी होते हैं। लेकिन सिर्फ अच्छा होना ही कभी पर्याप्त नहीं होता, न अपने जीवन में, न अपने परिवार में, न दफ्तर में और न समाज में, अच्छा करना भी अनिवार्य है। बिना कुछ किए अच्छा होने की बजाय कुछ करके अच्छा न होना या अच्छा न कहलाना अधिक श्रेयस्कर है। समाज को ऐसे निष्क्रिय अच्छे लोग ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाते हैं। इसका अर्थ यह है कि वे समाज के लिए जो कर सकते हैं, वो नहीं करते। इसलिए समाज आगे नहीं बढ़ता। समाज को आगे ले जाने के लिए अपनी अच्छाई का, योग्यता तथा कुशलता का पूर्ण उपयोग करना भी अनिवार्य है। समाज का पूर्ण विकास तभी संभव है जब हर व्यक्ति अपनी क्षमता और योग्यता का पूर्ण उपयोग समाज के हित में करंे।
    हर व्यक्ति अपरिमित क्षमता से युक्त है, कुछ व्यक्ति अपनी क्षमता को पहचान कर उसका विकास नहीं कर पाते। लेकिन अनेक व्यक्ति दुर्लभ गुणों और योग्यताओं से सम्पन्न होेते हैं। पर यदि वे कामचोर और आलसी होंगे तो समाज का विकास कैसे होगा? 
    समाज की उन्नति और समाज की उन्नति द्वारा स्वयं की उन्नति के लिए अच्छे लोगों को अपना पूर्ण योगदान देना ही होगा। यदि उनकी निष्क्रियता से समाज या राष्ट्र कमजोर होता है तो वे भी इससे अछूते नहीं रहते। यह उनके स्वयं के हित में होता है कि वे अपनी क्षमता और योग्यता का पूरा-पूरा उपयोग समाज के हित में करें। 
    समाज का पूर्ण विकास होने पर कम योग्य या आलसी और कामचोर लोग भी धीरे-धीरे इस प्रक्रिया में शामिल होने लगते हैं। अच्छे लोगों के आगे आने से समाज का हर वर्ग प्रेरित होता है और विकास में सहयोग देता है। इससे विकास की प्रक्रिया तेज होती है और पूरा समाज लाभान्वित होता है, समृद्ध होता है। 
    समृद्धि भी लोगों को अच्छा बनाने में सहायता करती है। समृद्ध और संतुष्ट समाज में अपराध कम होते हैं। इसलिए समाज के सर्वांगीण विकास के लिए अच्छे व्यक्तियों को आगे आना ही चाहिए और अपन कर्म तथा आचरण से नए मानदंड स्थापित कर समाज के लिए प्रेरणा और उत्प्रेरक तत्व का काम करना चाहिए। इसी के बारे में गीता में लिखा हैः
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्त देवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनु वर्तते।
    अर्थात श्रेष्ठ पुरुष जो आचरण करता है, सामान्य जन उसी का अनुसरण करते हैं। श्रेष्ठ व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत आदर्श तमाम लोगों के आदर्श बन जाते हैं। इसलिए समाज के उत्थान के लिए श्रेष्ठ व्यक्तियों को अपने कर्म द्वारा सदा आदर्श ही प्रस्तुत करना चाहिए। उनकी कर्मशीलता और अध्यवसाय पूरे समाज को कर्मशील और अध्यवसायी बना देता है। 
    प्रायः यह देखा गया है कि अच्छे लोग जितना अधिक कार्य करते हैं उन्हें उतनी ही आलोचना सुननी पड़ती है। यह तो होगा ही। क्योंकि जो समय पर पहुँचते हैं, उन्हीं से समय पालन की अपेक्षा रखी जा सकती है।