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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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आत्मकल्याण

शिष्य की अशांति बढ़ी और बढ़ती ही चली गई। जब चित्तवृत्तियाँ अनियंत्रित हो उठीं तो वह अपने गुरुदेव के चरणों में जा गिरा। प्रार्थना करते हुए उसने निवेदन किया भगवान्! आज मन बड़ा अस्थिर लगता है इतने दिनों की साधना और तप सब आज ही भंग हो जाएगा।”

आचार्य प्रवर कुछ देर तक निश्चल बैठे विचार करते रहे फिर बोले मन का सीधा संबंध अन्न से है कहीं तुमने कुछ चुराकर तो नहीं खा लिया।”

“नहीं नहीं देव! ऐसा तो नहीं है किन्तु आज मैं एक नगर भोजन में अवश्य सम्मिलित हुआ था। कहते हैं कि जिस सेठ ने यह भोज दिया व बहुत धर्मात्मा पुरुष है। नगर में उसका अन्नक्षेत्रा चलता है उसकी धर्म-कर्म में अत्यंत रुचि है वह देव पूजा अतिथि पूजा आदि शुभ कर्मों में संलग्न रहता है, उसके द्वार से याचक निराश नहीं लौटता। आज के भोज में अनेक लोग सम्मिलित थे। सेठ ने सभी का बड़ा आदर-सत्कार कर उनको भोज के साथ दान-दक्षिणा भी दी और सबका उचित सम्मान भी किया।”

आचार्य हँसे और बोले ठीक है अब समझ मंे आया कि जो तुमने खाया वह बिना परिश्रम का ही नहीं था वरन अनीति का भी था। जिस सेठ ने यह भोज दिया उसने वृद्धावस्था में एक गरीब घर की लड़की से विवाह किया और वह भी धन लेकर। यह भोज उसने पाप से बचने के लिए ही किया है। अब जब तुमने खाया ही पाप का है, तो उसका फल तो भुगतना ही पड़ेगा।”

आत्मकल्याण के इच्छुक को सदैव अपने परिश्रम और ईमानदारी से कमाया हुआ अन्न ही ग्रहण करना चाहिए।

 

 

आत्मकल्याण

शिष्य की अशांति बढ़ी और बढ़ती ही चली गई। जब चित्तवृत्तियाँ अनियंत्रित हो उठीं तो वह अपने गुरुदेव के चरणों में जा गिरा। प्रार्थना करते हुए उसने निवेदन किया भगवान्! आज मन बड़ा अस्थिर लगता है इतने दिनों की साधना और तप सब आज ही भंग हो जाएगा।श्

आचार्य प्रवर कुछ देर तक निश्चल बैठे विचार करते रहे फिर बोले मन का सीधा संबंध अन्न से है कहीं तुमने कुछ चुराकर तो नहीं खा लिया।श्

श्नहीं नहीं देव! ऐसा तो नहीं है किन्तु आज मैं एक नगर भोजन में अवश्य सम्मिलित हुआ था। कहते हैं कि जिस सेठ ने यह भोज दिया व बहुत धर्मात्मा पुरुष है। नगर में उसका अन्नक्षेत्रा चलता है उसकी धर्म.कर्म में अत्यंत रुचि है वह देव पूजा अतिथि पूजा आदि शुभ कर्मों में संलग्न रहता हैए उसके द्वार से याचक निराश नहीं लौटता। आज के भोज में अनेक लोग सम्मिलित थे। सेठ ने सभी का बड़ा आदर.सत्कार कर उनको भोज के साथ दान.दक्षिणा भी दी और सबका उचित सम्मान भी किया।श्

आचार्य हँसे और बोले ठीक है अब समझ मंे आया कि जो तुमने खाया वह बिना परिश्रम का ही नहीं था वरन अनीति का भी था। जिस सेठ ने यह भोज दिया उसने वृद्धावस्था में एक गरीब घर की लड़की से विवाह किया और वह भी धन लेकर। यह भोज उसने पाप से बचने के लिए ही किया है। अब जब तुमने खाया ही पाप का हैए तो उसका फल तो भुगतना ही पड़ेगा।

आत्मकल्याण के इच्छुक को सदैव अपने परिश्रम और ईमानदारी से कमाया हुआ अन्न ही ग्रहण करना चाहिए।